Friday, March 2, 2018

Colours in me

Colours  in me
self portrait
Friends Fight for you,
Respects you,
 Encourage you,
 Need you,
 love you, Include you,
allways Stand by you.
painting shubnum gill


Monday, February 26, 2018

बीस साल बाद -3

16 -10 - 2017

रौशनी को अंधेरे की चादर लपेटती शाम धीरे धीरे रात की अोर सरकती जा रही थी। हमारी ट्रेन भी सरकती हुई स्टेशन के प्लैटफारम की ओर बढ़ रही थी। मै अपने फोन से विडीयो बनाने की कोशिश कर रही थी। हाथ कांप रहे थे, लड़खड़ाती तस्वीरे कैद करते हुए बार बार लग रहा था, जैसे फोन ट्रेन की खिड़की से बाहर गिरने को हो। शाम सवा पाँच बजे के बाद आखिर ट्रेन टाटा नगर स्टेशन के प्लैटफार्म पर रुक गई। मै भी जैसे ठहर सी गई।अनजाने में आँखे बीते वक़्त में जा, किसी की मुस्कुराहट को ढूढने लगी। मै आते जाते लोगो में किसी को पहचानने की कोशिश में थी। पहले की तरह, शायद कोई हमें लेने आया हो। पर ... कौन? अब तो वहाँ कोई नहीं जो हमें स्टेशन लेने आता! कुछ बेचैन भागते दौड़ते, कुछ मुस्कराते अौर कुछ स्थिर चेहरे इधर उधर दिख रहे थे। आखिर अपने शहर पहुँच गई मै, इस सच को मानने की कोशिश कर रही थी। फिर हड़बड़ा कर पैरो को कुछ घसीठते हुए ट्रैन से उतरने लगी, लगा कही गाड़ी के चल पड़ने से मेरा शहर ना छूट जाये। बब्बू ने कहा, "आराम से अभी टाईम है"। 
    बीस साल पहले उस प्लैटफार्म को मेरे पैरो ने छुआ था, या कहूँ मेरे शहर ने मुझे छुआ था, जब 1997 में मम्मी के साथ आई थी। पर इस बार लग रहा था, मानो वहाँ की पूरी हवा मुझ में समा गई हो। गहरी सांस लेकर ट्रेन से उतर कर हम स्टेशन से बाहर निकले। पहली बार अपने ही शहर में अपने घर में ना ठहर होटल में ठहरने जा रही थी। होटल पहले से ही बुक था। एक बड़े बेढंगे ऑटो में बैठ कर हम होटल के लिए चल पड़े। हमें वही पुराना, पहचाना, मेरे अंदर तक बसा नाम 'साकची' जाना था। जहाँ ना जाने कितने साल गुजारे थे। पता भी ना चला कब नये नये एहसास में लिपटते हुए बचपन जवानी की ओर कदमों को बढ़ाती हुई बढ़ चली थी। ऑटो के ऊचे सीट की वजह से हम बाहर ठीक से देख नही पा रहे थे। झुक-झुक कर जाने पहचाने  रास्तो को पहचानने की कोशिश में थे। स्टेशन से निकल कर पुल पर जाने वाला ऊपर की ओर चढ़ता रास्ता अब भी पहले की ही तरह टूटा फूटा, ऊबड़ खाबड़ था। ऊपर वही पुराना पुल। आगे बर्मा-माइंस में इस्टप्लांट की बस्ती कहाँ गई, समझ नही पा रहे थे।

जगह-जगह पहचाने रास्तों ने कुछ नये नये दुकानो के जामा पहन रखे थे, उन्हे पहचानने में परेशानी हो रही थी। शायद सड़क से दूर  वो छोटी सी बस्ती घनी हो सड़क से आ मिली थी कुछ आगे बढ़ने के बाद हम सोच रहे थे, हमारी मोटर पार्टस की दुकान कहाँ गई? वही कहीं तो थी, एक पुल के पास? एक तो धुंधली यादो में लिपटी बीस साल बाद आई थी, ऊपर से शाम की स्लेटी चादर ओढ़े हमारा शहर। पहले दुकानो की इतनी भीड़ नहीं थी। साकची की एक गली में जब ऑटो मुड़ कर चलने लगा, कुछ समझ नही आया हम कहाँ जा रहे थे। रौशनी फेंकती दुकानो की भीड़ से आँखे चौधिया कर रास्ता भूल बैठी। सब कुछ अनजाना लगने लगा। मै सोच रही थी शहर में साकची का चेहरा ना सही, कम से कम हाथ पैर, कुछ तो पहचान पाऊ। देखते देखते हमारा औटो एक होटल के सामने खड़ा हो गया। सोच रही थी कितनी जल्दी पहुँच गये? दिल्ली में तो थोड़ी दूर जाना हो,  वक़्त की  लम्बाई  इतनी लम्बी होती कि इंतज़ार करते करते आदमी थक जाये, लगता समय खत्म ही नही हो रहा! 
होटल के बाहर खड़े हो कर आस पास देखा, लगा जैसे हमारा शहर हमें पहचान ही ना रहा हो। सोच रही थी, ये कौन सी जगह है? औटो वाले से पता चला ATM पास ही था। बब्बू अब जगह को कुछ-कुछ पहचान रहा था। कहने लगा करनैल होटल पास ही है, हम थोड़ी देर बाद वहाँ चलते है कुछ खाने। होटल के रजिस्टर में हम दोनो का नाम लिख कर, जब होटल वाले ने हमारे बीच का रिश्ता पूछा तो, हमे हंसी आ गई। जैसे हम सोलह साल के लड़का-लड़की घर से भाग कर आए हो। बब्बू ने बहन कह कर हँसते हुए कहा, गर्ल-फ्रेन्ड होती तो नहीं रहने देते? उसने कहा, नही सर। 
हम होटल के कमरे में पहुँच कुछ देर दो दिनो के थके पैरो को बिस्तर पे पसार कर पड़े रहे। बब्बू फोन पर अपने दोस्त राम कुमार से बाते करता रहा। उसी ने होटल में रहने का इंतजाम किया था। फिर थोड़ा फ्रेश होकर हम कुछ खाने-पीने निकल पड़े। बब्बू ATM से पैसे निकाल रहा था अौर मै उस अंधेरी रौशनी में अपने शहर के उस हिस्से को पहचानने की कोशिश। करनैल होटल करीब ही था। वहाँ पापा के साथ जाते थे, कभी कभी, पर वहाँ बैठते नही थे, क्योंकि शाम होते ही वहां दारू पीने वालो की भीड़ हो जाती। होटेल का मालिक पापा की बहुत इज्जत करता था , खाना पैक करवा देता। पहले सोचा था, वहाँ कुछ नॉन-वेज खाया जाय।  ये होटल कभी दारू अौर मूर्गमस्सलम का अड्डा हुआ करता था, पर अब वैष्णो हो गया है। बाहर से खाली खाली बेकार लगा हम आगे बढ़ गये। अब रास्ते हमें अौर हम रास्तों को पहचानने लगे। वही पुराना सब्जी-बाज़ार, कुछ बदला नही था।

बाज़ार के अन्दर से आलू प्याज़ की वो ऊची दुकान मेरी तरफ झांक कर मुस्कुरा रही थी। ना जाने कितनी बार उस दुकान में मम्मी के साथ गई थी। हम बाज़ार के अन्दर ना जा, आगे की अोर बढ़ गये। हमने तय किया, बांदी रोड, जहाँ हमारा घर था, सुबह जाएंगे, अंधेरे में जाने का कोई फायदा नही था। मछली बाजार की गली भी दिखी, वहाँ एक आदमी बड़ा सा टब ले कर बैठा था। शायद पहले की तरह ज़िन्दा मागुर माछ यां केकड़ा बेच रहा था! वहाँ ना जा, हम मिट्टी के खिलौनो की दुकान में पहुँचे। सुबह आ कर खरीदने की बात की। दुकानदार ने सुबह अौर रंगो की लक्षमी ला कर देने की बात कही। एक ठेले वाले से सेब खरीदे, वो खुश हो कर बाते कर रहा था, हमारे समय का था। बता रहा था, पुराने होटल बन्द हो गये, जो वहाँ आस पास हुआ करते थे। बसंत टॉकीज़, जहाँ हम फिल्म देखने जाया करते थे, बन्द हो चुका था। वहाँ बसंत एन्क्लेव बन रहा था। हम अपने पुराने पहचाने साक्ची बाज़ार के रास्ते में घूमने लगे। 
जमशेदपुर में बहुत अच्छी मिठाईया मिलती थी। सोचा, मिठाई खाई जाए। एक मिठाई की दुकान के बाहर सीड़ी पर बैठ कर एक औरत बड़े से दोने में सफेद रस मलाई जैसा कुछ खा रही थी। दुकान में जाकर बब्बू ने कहा, "वो औरत जो खा रही है हमें भी देना"। दुकानदार ने झांक कर देखा फिर कहा वो नही जनता वो क्या खा रही है।
बब्बू ने मुझे उस औरत से जाकर पूछने को कहा। मै बहुत कम बात करती हूँ जिन्हे नही जानती यां थोड़ी बहुत जानपह्चान भी हो तो भी उनसे ज्यादा बाते करना मुश्किल लगता। मै उसके पास जा कर मुस्सकुराई, ताकि उससे पूछ सकू। वो मुस्कुरा कर बोली, "लगता है आप बाहर से आई हैं"। जब पता चला मै भी जमशेदपुर की ही हूँ, और दिल्ली से आई थी बहुत खुश हुई।अब वो बोलती जा रही थी, मै तो देखते ही समझ गई थी, जमशेदपुर तोमार् मायका है, दिल्ली ससुराल। फिर पति, बच्चा, मकान, फैमली, मेरे बारे उसने ही सब कुछ बता दिया, पता नही क्या बोलती रही, मै कुछ बोलू उसने मौका ही नही दिया। मै कुछ कहने लगती, बीच में ही काट कर मेरी बात पूरा कर देती। फिर खड़ी होकर बोली "बहुत अच्छा लगा तुम से मिल कर", आसी बोल कर भीड़ में अपने बच्चे के साथ वो बढिया सा खाने की चीज़ को राज बना, गायब हो गई। उस दुकान से एक एक मीठा चम चम खाया। कोई खास नही लगा। थोड़ी सी मिठाई पैक करवा कर वही बाज़ार में घूमने लगे, पर वो बात मन में अटकी रही- वो औरत इतनी सारी मिठाई कहाँ से खरीद कर खा रही थी?
घूमते घूमते हम साकची के मशहूर मिठाई की दुकान भोला महाराज के सामने पहुंचे। दुकान के ठीक बाहर एक आदमी साईकल पर बड़े-बड़े दोने में वैसा ही कुछ बेच रहा था, जैसा वो औरत खा रही थी। थोड़ा पास जा कर देखा, टुकड़े किये इडली के ऊपर सफेद चटनी। कुछ अंधेरा अौर कुछ दिमाग में छाए मिठाई के भूत की वजह से इडली रस मलाई बन गई थी। हम दोनो हसँने लगे। बब्बू कहने लगा, अच्छा हुआ पता चल गया, नही तो सारे वक़्त दिमाग में घूमता रहता, आखिर वो खा क्या रही थी? 'भोला महाराज' अब दिल्ली के मिठाई की दुकानों की तरह दिखा। बाहर निकल आये, बेकार वहाँ क्या खाना सोचा। फिर वही सवाल खड़ा था, कहाँ कुछ बढ़िया खाया जाय। राम कुमार को फोन किया, उसने पास ही आमबगान में एक होटल बताया। हम रिक्सा ढूढ़ने लगे, एक भी नही मिल रहा था। किसी से पूछा, पता चला रिक्से बन्द होते जा रहे थे। कहा, ऑटो ले लें पास ही है। ऑटो वाले को बहुत जल्दी थी जल्दी जल्दी अभी बैठे ही थे, कहने लगा जल्दी से उतरो, हम पहुँच भी गये थे। वहाँ वो ज्यादा देर गाड़ी खड़ी नही कर सकता था। 
होटल पास ही था. अौर साफ सुथरा भी। मै मिर्च नही खाती हूँ, खाने में मिर्च मसाला नही थी। मुझे वहाँ खाना अच्छा लगा। खाना खाने के बाद हम रिक्सा ढूँढ़  रहे थे, पर मिला नही। रिक्सा वहाँ बन्द होते जा रहे हैं। हर तरफ शेयर वाले औटो भर गये थे। गोलचक्कर तक पैदल गये, रात के अंधेरे में भी सब कुछ बहुत पास-पास और पहचाना लग रहा था। फिर ओटो ले कर होटल पहुँचे.. 
बिस्तर पे लेटे लेटे मै यूँ ही कुछ सोच रही थी, बब्बू फोन पे बाते कर रहा था। वो जिससे भी बात करता, कहता डिड्ल एक बार आना चाहती थी, इसलिये वो उसे लेकर आया। क्या उसे अपने शहर से लगाव नहीं था? सिर्फ मेरे लिए ही वह यहां आया? ये बात मुझ पर किया जाने वाला एहसान बन कर, मुझे दूर कही सुनसान, अकेले में छोड़ आया। अौर मै सबसे जुदा, अकेली, अपने अन्दर समा गई।  राम कुमार हमारे लिए अच्छे से अच्छा इंतजाम कर रहा था। दूसरे दिन के लिए एक टैक्सी बुक थी, ताकि हम सारा दिन आराम से घूम सके...

Shubnum gill

Sunday, February 25, 2018

मुस्कुराहट

उस दिन किसी काम में मन नही लग रहा था l सोच रही थी स्केच करू, पर जो भी बना रही थी सब बेकार l बैठ कर फिल्म देखू , थोड़ा सा देख दूसरी फिल्म, उसे छोड़ तीसरी, चौथी .... l आचानक फिल्म छोड़ अलग अलग फिल्मो के गाने देखने लगी l जो मधुबाला पे आ कर ठहर गई l गानो में फिर तो बस मधुबाला ही मुस्कुरती जा रही थी l उसकी मुस्कुराहट मुझे बहुत अच्छी लगती है l चेहरा बनाने लगी l पता चला उस दिन ही मधुबाला का जन्म दिन भी था l सो जल्दी में मधुबाला की मुस्कुराहट को अपने अन्दर महसूस करने की बस एक छोटी सी कोशिश थी l फिर कभी इतमिनान से मधुबाला के साथ बैठूँगी l  



Madhubala
(Mumtaz Jehan Begum Dehlav)
14 February 1933 - 23 February 1969

Monday, January 1, 2018

बीस साल बाद - 2

15 - 10 - 2017
बीस साल बाद - 2 


15th अक्टूबर को हम एक आधी (RAC) और एक पूरी टिकट लेकर नीलाचल एक्सप्रेस से चलने को तैयार हुए। जाने की खुशी में सारी रात आँखो से नींद गायब रही। कब सुबह के चार बज गये पता ही ना चला। उठ कर यू ही कुछ बेकार के काम निपटाती रही। नीलाचल को सुबह 6:35 पर चलना था, पता चला लेट है। पहले जिस दिन हमें जाना होता था, सुबह तीन बजे उठ कर पूरी अौर आलू की सब्जी बनाते, साथ में आचार, चनाचूर, उबले अंडे, ब्रेड, जैम, चीज़, ना जाने क्या क्या खाने का सामान पैक होता। चौबीस घंटे का सफर फिकनिक मनाते गुज़रता। इस बार सिर्फ चार अंडे उबाले, ब्रेड, चीज़, जैम लिया। निकलते समय ठेले वाले से दो प्लेट पोहा के पैक करवा लिए। ट्रेन लेट होती जा रही थी, जाने का इंतजार मुझे तकलीफ दे रहा था। ट्रेन के लेट होने का सिलसिला आखिर 9:40 पे जा कर ख़त्म हुआ। ऐ सी का टिकट नही मिला था, हम स्लीपर क्लास में जा रहे थे। मै खुश थी क्यों कि ऐ सी में उसकी काँच ढ़की खिड़की बाहर की दुनिया से हमे अलग कर देती है। और स्लीपर क्लास की खिड़की के पास बैठ कर लगता है जैसे बाहर की हरीभरी दुनिया मुझे अन्दर तक छूती हुई चल रही हो। 
हम स्टेशन पहूँच कर ट्रेन में चढ़े। मेरा एक अौर बब्बू का नौ नम्बर कोच था। हमारे पास ज्यादा सामान नही था, सीट के नीचे रख दिया। ट्रेन में जाने वाले अौर उन्हे पहुँचाने वालो की भीड़ अौर शोर के बीच मै सिकुड़ कर एक कोने में बैठी लोगो के सामान के बीच अपना पैरो को कहीं रखने की कोशिश कर रही थी। सोचा पहले की तरह जब ट्रेन चल पड़ेगी, शांति हो जायेगी। पर ट्रेन के चलने के साथ साथ भीड़, धक्का-मुक्की, शोर अौर बड़ता चला गया। मै बीस साल पहले भी नीलाचल से गई थी। एैसा लग रहा था, जैसे उसी बीस साल पुराने डब्बे में बैठी हुँ, जो खटारा हो कर कुछ ज्यादा ही झटके मार रहा था। मुझे बार-बार अपने पैरो के लिए जगह बनानी पड़ रही थी। ट्रेन ने अपनी धीमी चाल को बनाये रखते हुए, रूकती-चलती अपने लेट होने के सिलसिले को बढ़ाना जारी रखा। बब्बू अौर मै अलग अलग डब्बो में बैठे थे। मेरे डब्बे के ठीक बगल वाला डब्बा पैन्ट्री कार था, जहाँ जितनी बार खाने में छोंका लगता हमारा डब्बा धुये से भर जाता। आँखो में जलन होने लगती। मै खिड़की के पास बैठी थी फिर भी हालत खराब थी। टायलेट के बारे में कोई क्या कहे, वहाँ तक पहुँचना मतलब कितने बैठे लोगो के ऊपर से या धक्का देते जगह बनाते शायद पहुँच जाऊ। अगर बीच में ही अटक गई मैं ना इधर ना उधर। अौर अगर टायलेट तक पहुँच जाये कोई तो उसका हाल क्या कहूँ। बस खाना-पीना जितना कम हो, वही अच्छा। कम से कम टायलेट के दर्शन हो, वही भला! शाम तक बैठे बैठे मेरे पैर सूज गये अौर कमर अक्कड़ गई। 

पन्द्रह तारीख़ जैसे तैसे बीता। बब्बू का टिकट R A C था, यानी एक सीट में दो लोग। दूसरा आदमी कुछ ज्यादा ही तन्दरूस्त था, सीट पर उसके लेट जाने के बाद दूसरा ..... सो बब्बू मेरी सीट पर मेरे साथ सोने आ गया। जिन लोगो की टिकट वेटिग थी, टी टी को उन लोगो की बहुत फिक्र हो रही थी। कोने में ले जाता, वहाँ खुसुर-पुसुर होती, जेब गर्म हो जाती तो छोड़ देता। इसलिए काफी भीड़ थी. हर सीट में दो दो लोग। मेरा लोअर बर्थ था। जमीन पर दोनो लोअर बर्थ के बीच वाली जगह में ठीक ठाक लम्बे चौड़े दो लोग अटे पड़े थे। अपनी सीट से उतरना चढ़ना मुश्किल था। बब्बू जैसे तैसे मेरी सीट पर आ कर लेटा। अभी सोई ही थी कि सुबह हो गई, उठ कर बैठ जाना पड़ा, क्योंकि वेटिंग टिकट वालो के अलवा हर स्टेशन में चढ़ने वालो को भी बैठना था। पहले ये नीलाचल अच्छी ट्रेन मानी जाती थी। तकरीबन सही समय पर चलती, ज्यादा से ज्यादा दस पनद्रह मिनट देर से पहूँचती, हाँ, कभी कभी ज्यादा लेट करती। पर अब सबसे घटिया ट्रैन बन चुकी है। 
सोलह तारीख़ भी सारा दिन हालत खराब रही। रोते-धोते, रुकते-चलते गाड़ी ने सुबह 7:35 की जगह शाम पाँच बजे के बाद पहूँचना था। यानी सोलह तारीख़ भी गया। अब हमारे पास सतरह तारीख़, यानि, सिर्फ एक दिन रह गया था।

शबनम गिल   

Saturday, December 30, 2017

1. बीस साल बाद

                               बीस साल बाद

बहुत सालो से मै अपने शहर में एक बार जाना चाहती थी, जहाँ मै पैदा हुई। पर मेरे घर में मेरी चाह, इच्छा की कभी कोई जगह नही रही, सो किसी ने कभी मेरी किसी बात को गंभीरता से लिया ही नही। हमेशा की तरह, मेरी इच्छाओ का सीने के अन्दर किसी कोने में उभर कर डूब जाना एक साधारण बात बनी रही देखते देखते बीस साल बीत गये। 
मै कुछ दिन पुरानी बीती बातो को याद करते हुए किसी के साथ वहाँ रहना चाहती थी, जो उस बीते वक्त्त में मेरे साथ रहा हो। शायद कुछ आधी, कुछ पूरी, भूल चुकी बाते फिर से ज़िन्दा हो उठती!
वहाँ परिवार में हम पाँच लोग थे। मम्मी, पापा, बड़ा भाई बब्बू, मै, और छोटा भाई ताज फिर पाँच के साथ दो सदस्य अौर जुड़ गये। एक, कमला, पूरा घर उसी के हवाले था, वो हमारे घर में काम करती थी। दूसरा, कोई ना कोई कुत्ता हमेशा हमारे साथ रहा। अब सिर्फ मै अौर मेरा भाई ही रह गये है। मै बब्बू के साथ जाना चाहती थी। "हां चलते हैं, कह कर वो भी उसे एक भूली बात बना भूल गया, पर मै बहुत बेचैन थी। समझ नही पा रही थी, जहाँ हम रहते थे अपने उस घर का कैसे, किससे पता करू। वो घर अब है भी यां टूट चुका! किसे फोन करू? मेरे पास किसी पहचान वाले का न पता था ना ही फोन नम्बर। एक दिन इनटरनेट पर एक नम्बर मिला, जिसका पता मेरे घर के पास का था-"city news" वहाँ  फोन किया। किसी अनजान से बात की। वो बहुत खुश हुआ, क्योंकि मै उसके शहर की थी। उसने बताया वहाँ के सारे मकान टूट चुके थे अौर अब वहाँ कुछ नही था। उसने फोटो खीच कर भेजने की बात भी कही, पर शायद भूल गया। 
मेरा इनटरनेट पे किसी जान पहचान को ढूढ़ने का सिलसिला जारी रहा। आखिर  Nag  Motor Training  Institute का फोन नम्बर मिला। नाग मोटरस मेरे घर के बहुत पास, बच्चपन से एक बहुत ही करीबी पहचाना नाम रहा है। उसके सामने से हमारा हर रोज़ का आना जाना था। वहाँ बस ट्रक, कार आदि गाड़ियां चलाना सिखाया जाता था। पहले वहाँ बस जैसी एक बड़ी सी गाड़ी हुआ करती थी, जिसके आगे दो लोगो के बैठने की जगह होती थी। जहाँ ड्राइवर और ड्राइविंग सीट पर सीखने वाला बैठता। पीछे दांये-बांये दो तरफ बने लकड़ी के फट्टे की सीट पे बैठे लड़के अपनी बारी का इंतज़ार करते। वहाँ फोन किया, पता चला सारे घर टूट चुके है, यानी मेरा घर भी अब नही रहा। पर पेड़ अभी कटे नही थे। उन्हे बहुत बहुत शुक्रिया कह कर उस दिन देर रात तक अपने घर और वहाँ आस पास के पेड़ो के बारे मै सोचती रही। ना जाने कब उन्हे काट फेंका जायेगा, ऊँची-ऊँची ईमारते बनाने के लिए! एैसा महसूस हो रहा था जैसे मेरे पेड़ भी एक आखिरी मुलाकात के लिए मेरे इंतजार में खड़े हों। नाजुक से स्वर्ण चम्पा के होने की मुझे बहुत कम उम्मीद थी। 

जब हम उस घर में  रहने गये थे, आंगन में एक बड़ा नीम का पेड़ अौर एक बहुत बड़ा, पूरे आंगन अौर घर के छत पे छाया हुआ, आम का पेड़ था, जिसे देख कर मै बहुत खुश हुई थी। वे दोनों मेरे नये दोस्त बन गये थे। नीम के पेड़ से गिरी निमोणीयो को इकठ्ठा करना, उनसे खेलना, आज भी याद आता है। छत पे चढ़ कर, मै अौर मेरी दोस्त आम के पेड़ की टहनीयों पर बैठ कर खेलते। सालो तक हमारी उन पेड़ो से दोस्ती बनी रही। आम के पेड़ में छोटे छोटे बहुत मीठे रसीले आम लगते थे, जिन्हें खा कर हमने गुठली बगीचे में फेंक दी थी। कुछ दिनो बाद आचानक देखा, दो गुठलियों से नाजुक, नन्हे पौधे अंकुरित हो रहे है! हम खुशी से उछल पड़े। उसके आस पास की जगह साफ की। उस जगह को उनका घर बना दिया। देखते देखते ना जाने कब दोनों बड़े पेड़ बन गये। दोनो एक दूसरे के पास इस तरह खड़े थे जैसे जुड़वा हों। इनके बड़े होते होते आंगन वाला आम का पेड़ मर गया। बगीचे वाले आम के पेड़, पहली बार जब बौर से भर गये, पापा बहुत खुश थे, कहने लगे, बहुत आम होंगे। उस साल हमने अपने प्यारे पेड़ो के पहले आम खाये। बहुत मीठे रसीले, बिलकुल आंगन वाले पेड़ के आम की तरह। उन पेड़ो को देख कर लग रहा था, आंगन वाले बड़े आम के पेड़ के दो बच्चे बगीचे में खड़े मुस्कुरा रहे हैं। 
और वो रीठे का मेरा प्यारा पेड़, जो पड़ोसी के बगीचे में होकर भी हमारा बन बैठा था। हमारे पड़ोसी काफी नाराज़ थे, अब हम से या पेड़ से मालूम नही। मम्मी से झगड़ा करने लगे, ये कहते हुए कि, "हमारा पेड़ तो आप को ही रीठा देता है"। मम्मी ने हसँ कर कहा, "आप हमारे गार्डन में आ कर रीठा चुन लिया करे"। पड़ोसी खुश हो गये हर मौसम में हमारा बगीचा रीठो से भर जाया करता था।   
      दिवाली में वहाँ  खूबसुरत रंगो वाले मिट्टी के खिलौने (बरतन), हाथी, घोड़ा, कई  दियों वाली लक्ष्मी मिलती थी। वहाँ की खास 'फोक आर्ट' हम हर साल खरीदते थे। दिवाली वाले दिन लक्षमी के सारे दीये जब एक साथ जलते, बहुत खूबसूरत लगती लक्षमी। 
मै दिवाली से एक दो दिन पहले पहुँच कर खिलौने अौर लक्षमी खरीदना चाहती थी। दिवाली उन्नीस अक्टूबर की थी. आखिर हा नही, हा नही करते हुए पन्द्रह अक्टूबर को जाना तय हुआ और अठ्ठारह को वहाँ से चल कर उन्नीस, यानी दिवाली के दिन वापस दिल्ली। बब्बू के पास ज्यादा वक्त नही था। उसका कहना था 15th की सुबह चलेगे 16th की सुबह वहाँ पहुँच जायेंगे, सारा दिन हमारे पास होगा। 17th  का  पूरा दिन भी घूमने के लिए रहेगा। फिर 18th की शाम वहाँ से चलेगे। उस दिन भी घूमेगे। छोटा सा शहर है, इतने दिन काफी है, इससे ज्यादा वहाँ क्या रहना। 
मैने कुछ नही कहा, जो तय हुआ मान लिया। सोचा कम से कम जा तो रही हूँ, वही बहुत है। 
जाना नीलाचल एक्सप्रेस से और लौटने का टिकट पुरषोत्तम का था। बाद में पता चला पुरुषोत्तम एक्सप्रेस 18 की शाम नही, सुबह 6:35 पे वहाँ से चलती थी, सो अठ्ठारह का दिन हमारे हाथ से गया

 2017 
शबनम गिल 

Tuesday, December 19, 2017

शालिनी

एक लाल पत्ता 


सुबह सुबह उसने गर्म बिस्तर में पड़ी शालिनी को एक लाल पत्ता दिया अौर कहा, "उसके शहर में एक मौसम आता है जब सारे पेड़ पहले लाल पत्तों से भर जाते है, फिर पीले पत्तों से। इसके बाद पत्ते झड़ जाते है"। ... शायद नये पत्तों के इंतजार में! अब एक लाल पत्ते से, पूरे पेड़ पर छाई लाली की खूबसूरती को भला कोई कैसे महसूस करे? ये लाल पत्ते की बात सिर्फ कुछ कहने के खातिर कही गई, उसके शहर की एक बात थी। जो शालिनी के शहर की बात नही थी अौर ना ही उस जनाब के माँ के शहर की बात, जहाँ वो पैदा हुआ था। उसकी माँ ने कभी उसके शहर को नही देखा, पर उस शहर को देखने की चाह, उस माँ के सीने के अन्दर कही  किसी गहरे, अंधेरे कूए में पड़ी रही उस कूए को सालो से खोदते, खोदते वो काफी दूर निकल चुकी थी ये कूआं उसके 'लाल' की खातिर ही खुदा, जिसने अपनी माँ के बुने पंख लगा कर उस लाल पत्तों वाले देश की तरफ उड़ जाना था। जो अब उसका देश उसका शहर बन गया लेकिन वो देश वो शहर उसकी माँ का नही था।
आधे ख्वाब से आधी जागी, बन्द आँखो को थोड़ा सा खोल कर शालिनी ने कहा, " वहाँ टेबल पर रख दो"
एक सूखा निर्जीव लाल पत्ता, एक सफेद निर्जीव लकड़ी के टेबल पर पड़ा था

शबनम गिल  

Thursday, December 7, 2017

शालिनी.......

                               शालिनी

सुबह सुबह ठीक पांच बजे के पोगा (कम्पनी के सायरन) के साथ वो पैदा हुआ था। सब बहुत खुश थे, लड्डू भी बटे, पर शालिनी को पैदा होने की कोई जल्दी नहीं थी। कौन से लड्डू बटने थे, सो आराम से अंगड़ाई लेते हुए सुबह दस बजे के बाद पैदा हुई थी वह। न जाने और भी कितनी शालिनिया पैदा हुई होंगी उस दिन! कितनो का पैदा होने के पहले या पैदा होने के बाद कत्ल हो गया हो! अब उनका कौन हिसाब रखे?
खैर जो भी हो, ये शालिनी तो एक रौशन ख्याल, पढ़े लिखे परीवार में पैदा हुई थी। नई नई बाते, जानकरिया रोज़ आ बैठती महफिल जमाने। शेल्फ में मुस्कुराती किताबे खूबसूरत अन्दाज से झांकती।उसकी माँ अपने हाथों से बढ़ियाबढ़िया डीज़ाइन के कपड़े, स्वैटर अपने बच्चो के लिए बनाती थी। बच्चपन में हमेशा नीविया क्रीम, इस्तमाल होता था, जिसकी खुशबू आज भी उसके अन्दर बसी थी। अब भी उसे वही क्रीम अच्छा लगता था.


माधुरी की माँ

आज अचानक इतने सालो बाद शालिनी के सामने माधुरी की माँ आ बैठी। उनका नाम क्या था, मालूम नही। शायद कोई भी नही जानता था। स्कूल के टीचर्, मास्टर, चपरासी सब ही उन्हे माधुरी की माँ ही कहते थे।
बचपन मे शालिनी ने जब भी उन्हे देखा, बहुत परेशान, दुखी, खामोशी को अपने चारो ओर लपेटे हुए। पेट एेसा, जैसे हर वक्त एक घड़ा बांध रखा हो अौर उस घड़े के अन्दर कोई नन्ही सी जान  हमेशा सांसे लेती रहती। सर पे, जैसे बाजार का सारा सिन्दूर उड़ेल लिया हो। साधु, संत, बाबा न जाने किस किस के यहां अपनी सासू माँ तो कभी अपनी माँ, भाभियो के साथ घूमती फिरती। बस एक घर का चिराग, यानी  उस खानदान के वारिस की चाह में। ना जाने कितने ताबीज-गंडे-धागे बांध रखे थे अपने उस मरे खुचले से जिस्म पे। उसके बदन में अब भी धड़कते  दिल के साथ एक पिंजर था, जो साड़ी के नीचे से झांकती हुई उसकी एक-एक हड्डी का पता बताने की कोशिश करता। अक्सर उन्हे देख कर शालिनी को बायोलौजी की लैबौट्री में रखा वो इंसान का कंकाल याद आ जाता, जो उस स्कूल मे रखा था, जहां उसकी मम्मी पढ़ाती थी।
माधुरी की चार छोटी बहने थी अब छठवां आने वाला था। वह अपनी छोटी बहन बाला के साथ रोज़ स्कूल आती। दोनो के सर पे ढेर सारा सरसो का तेल पुता होता, जो कान के पास से चू कर उनके स्कूल यूनीफार्म के ऊपरी हिस्से पे मैल की परत पे परत चढ़ाता। दो चोटियों में बंधे लाल फीते काले रंग के होने का भ्रम पैदा करते। गले और हाथ में लटके ताबीज़ के काले धागे तेल से चिट चिट करते और एक सड़ी सी बू फैलाते।
उस दिन टीचरे गपशप कर रही थी। माधुरी को देख कर एक बोली, "इसकी माँ  ने ना जाने कितने मंगते पैदा करने है, एक तो संभाला जाता नही"! दूसरी जो थोड़ी बुजुर्ग थी, बोली "एेसा ना कह इन बच्चों को, इसमें इनका क्या दोष। इसकी माँ को बेटा पैदा करने के लिए ससुराल वालो ने परेशान कर रखा है। बेचारी की बेटियां ही बेटियां पैदा होती जा रही।" फिर आवाज़ कुछ धीमी कर दूसरी बोली, "अब तो इसकी सास ने आखरी चेतावनी भी दे दी है, इस बार बेटा नही, तो दूसरी बहू ले आयेगी।" गहरी सांस भर एक बोली, "रब करे, इस बार मुंडा हो जाये"।
   शादी से पहले माधुरी की माँ एक स्कूल मे पढ़ाती थी। शादी के बाद ससुराल वालो ने नौकरी छुडा दी, उस खानदान की औरते घर से बाहर जा कर नौकरी नही करती थी। माधुरी के माँ, बाप, भाइयो ने भी उसकी शादी कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पा ली और उसे उसकी किस्मत पर छोड़ दिया।

शालिनी को माधुरी की माँ पे बहुत गुस्सा आता था। वो सोचती, ये क्यू जुल्म सहती जा रही है? उन दिनों शारीरिक शोषण, मानसिक शोषण, घरेलू हिंसा गलत होती है, ये सोच कही थी ही नही, लड़की की शादी, बहुत जरूरी थी। रो धो के जैसे तैसे हो जाय। फिर जहां डोली गई उसी घर से अर्थी भी उठना होता था।
पर क्या आज हालात सचमुच बदल गए हैं...? अब भी जिस लड़की की शादी नही हुई वो बेचारी कहलाये। शादी के बाद बेटा पैदा नही हुआ, फिर बेचारी बन जाये। इतने सालो बाद शालिनी सोच रही थी क्या उसमे और माधुरी की माँ में ज्यादा फर्क है? फिर उसे खुद पे गुस्सा क्यू नही आ रहा? क्या वो भी  शादी कर घर  में जब-तब इस्तमाल के लिए ला कर रखी गई एक सामान भर नही है?

  शबनम गिल