Saturday, May 6, 2017

मेरे चाहने ना चाहने की बात




















मेरे चाहने ना चाहने की बात,
एक निवाले की तरह,
जा अटकी थी,
एक रौशन ख्याल, तरक्की पसन्द
मर्दानगी के गले,
फॉस बन चुभती रही,
साल दर साल,
अचानक बिना बात,
किसी बहाने,
मुस्कुराते होठो को लिये,
उसने मुझे काली कहा,
जो सिर्फ एक गाली थी.
[मुस्कुराते हुए, ना दिखते, पर दिखते हुए, कही ये एक मानसिक शोषण की बात तो नही?]      

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