Tuesday, May 2, 2017

पहचान

नाखुश चेहरों के बीच, 
एक तुम के घर कभी, 
एक मै पैदा हुई थी कहीं .

गैरकानूनी थी नही,
सो तुम के नाम से सजी,
दबी रही तेरे एहसांनो तले.

तुम की पहचान को लिए,
बढ़ती रही हर रोज़,
तेरी चाह, इच्छाओ में बंधी।

बार बार कई तुम,
आते जाते रहे,
मै को देखने, परखने,
ले चलने अपने घर!

आखिर एक तुम,
मै को अपने घर ले जाने,
का एह्सान कर गया.

तेरे घर आंगन में,
तेरे नाम से लपेटी गई,
मेरी हिफाजत का जिम्मा,
अब तुम के कंधो पे था.

आयना की मै खुश थी ,
खूबसूरत गहनो कपड़ो में,
नज़ाकत से भरी

जल्द ही एक मै,
पैदा होने को थी,
पर पहले ही कत्ल हो गयी
फिर बार बार,
मै के आने से,
लाल हुआ था कोख.

आज चेहरे खुश थे.
क्यों की एक तुम थे कोख में.
मै खास बनी,
सब ने लाड़ दिखाया,
खिलाया, पिलाया,खूब सजाया
दर्द तकलीफ में डूबी,
कमजोर जिस्म लिए,
जिंदगी थी दाव पे लगी,
तब एक तुम थे,
इस दुनिया में आये.

पर मै की पहचान तो,
सादे पन्ने सी रही,
एक तुम का नाम ही,
तुमकी पहचान बनी.

हर तुम की सेवा,
मै का फ़र्ज़ था,
जिम्मेदारियों से लादना,
तुम का मै पर एहसान बना.

अब तुम जवां हुए,
मै के जख्म, झुर्रियों तले,
अब भी थे हरे.

अब, एक मै तेरे लिए भी,
ढूढ़ने, देखने, परखने,
मै ही थी चली.

नवेली का आना,
उसके कोख में बार बार,
कई मै का कत्ल होना,
मेरे मै के जख्मो की दवा बनी.

फिर तो नवेली का ही,
कोख में एक मै के साथ कत्ल होना,
एक आम बात बनी.

फिर से नई नवेली,
लाल पैरो के निशान का,
मैं का, दरवाजे के अन्दर आना।
शबनम गिल

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